"नभचर" हिंदी कविता - अनुराग निम्भल | Nabhchar Hindi Poetry
नभचर
कवि - अनुराग निम्भल
वे उड़े जा रहे नभ में
ईश्वर के प्यारे नभचर
धूल भरे गुब्बारों से
दूर कहीं उड़कर
प्रकृति को धन्य कहकर
इंसानों के जुल्म सहकर
मरते जा रहे लगातार
हमे चढ़ा लालच का बुखार
खड़े कर दिए टावर बिजली के
उजाड़ दिया खगों का संसार
अभी भी वक्त है सुधर जा
समझ जा इनका योगदान
इनसे चले ये प्रकृति
प्रकृति से बना इंसान।

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