"मैं एक दिन बैठा था ताल पर" हिंदी कविता - अनुराग निम्भल | M Ek Din Hindi Poem

मैं एक दिन बैठा था ताल पर

कवि - अनुराग निम्भल

bhrastachar par hindi poem

मैं एक दिन बैठा था ताल पर
एक चिड़िया उड़ कर आई
बोली सुनोगे देश की हालत
पर तुम एक छोटी सी चौपाई

मैंने कहा कहो गौरैया
क्या संदेशा लाई हो
देश में चलते भ्रष्टाचार को
तुम भी भोगकर आई हो?

वो बोली मैं करके आई
आजाद भारत का दौरा
चौतरफा अब फैल चुका
भ्रष्टाचार का गाढ़ा कोहरा

कोई सो रहा फुटपाथ पर
किसी के पास में धन अपार
कोई तरसे रोटी को
किसी के चल रहे व्यापार

घर घर में रखते हथियार
अपने करते विश्वासघात
बेटा रहता बंगले में
मां बाप को वृद्धावास

नेता करते भ्रष्टाचार
कर्मचारी है रिश्वतखोर
सांप्रदायिक दंगे करवाकर
वोट मांगने निकले चोर

चहु ओर नफरत का शोर
आ चुका कलयुग का दौर
इज्जत बिकती बाजार में
संध्या से काली है भोर

मैंने कहा सुनो चिड़िया
समाज सुधारक तू मत बन
लोग नहीं ये सुधरेंगे
दिमाग में लग गया जंग

अकल तो सबको आएगी
समय बताना तनिक कठिन
जैसा फल बोया जिसने
वैसा फल मिलना एक दिन

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